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लंबे समय तक घुटने का दर्द: कारण और इलाज नोएडा में

आजकल, बहुत से लोग घुटनों के पुराने दर्द से परेशान हैं। इससे न सिर्फ़ चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है, बल्कि रोज़मर्रा के काम और मानसिक सेहत पर भी असर पड़ता है। सही समय पर जांच और इलाज से दर्द को कंट्रोल किया जा सकता है और घुटनों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है। नोएडा में कई ऐसे अस्पताल हैं जो घुटनों के दर्द के इलाज में माहिर हैं। अगर आप नोएडा में घुटनों के पुराने दर्द के लिए जांच या इलाज ढूंढ रहे हैं, तो एक अनुभवी ऑर्थोपेडिक अस्पताल चुनना बहुत ज़रूरी है।


लंबे समय तक घुटने के दर्द के आम कारण

घुटना शरीर का सबसे बड़ा जोड़ है और यह हर दिन दबाव और गतिविधियों का सामना करता है। लंबे समय तक दर्द के प्रमुख कारण निम्न हैं:

ऑस्टियोआर्थराइटिसः

उम्र बढ़ने, वजन अधिक होने या जोड़ की अधिक उपयोग से घुटने के कार्टिलेज घिसता है। यह सूजन, जकड़न और लगातार दर्द का कारण बनता है।

रूमेटॉइड आर्थराइटिसः

यह ऑटोइम्यून रोग है। जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली घुटने के जोड़ पर हमला करती है। इसके कारण जोड़ सूजते हैं। लाल होते हैं और लंबे समय तक दर्द रहता है।

पुरानी चोट और लिगामेंट/मिनिस्कस समस्याएंः

खेल, गिरने या किसी दुर्घटना के कारण हुई चोट लंबे समय तक दर्द का कारण बनती है। मिनिस्कस टियर या लिगामेंट इंजरी से जोड़ कमजोर हो सकता है और दर्द बार-बार लौटता है।

संक्रमणः

पुराने जोड़ में संक्रमण या सर्जरी के बाद संक्रमण घुटने में सूजन और लगातार दर्द का कारण बनता है।

मोटापा और जीवनशैलीः

अधिक वजन घुटनों पर दबाव बढ़ाता है। जोड़ जल्दी घिसते हैं। बैठे रहने या कम एक्टिव जीवनशैली से मांसपेशियां कमजोर होती हैं। जिससे दर्द लंबे समय तक बना रहता है।

गाउट और यूरिक एसिडः

यूरिक एसिड की अधिकता से जोड़ों में क्रिस्टल जमते हैं। जिससे अचानक दर्द और सूजन होती है।


कब डॉक्टर से संपर्क करें?

आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए अगर:


  1. दर्द इतना तेज हो कि चलना मुश्किल हो या पैर मोड़ना मुश्किल हो।
  2. लंबे समय तक सूजन और दर्द रहे, और घरेलू उपाय से आराम न मिले।
  3. जोड़ में लालिमा, गर्मी या बुखार महसूस हो।
  4. दर्द बार-बार लौटता हो या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित कर रहा हो।


नोएडा में विशेषज्ञ डॉक्टर समय पर जांच और सही निदान सुनिश्चित करते हैं।

घुटनों का पुराना दर्द सिर्फ़ बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या नहीं है; यह कई अंदरूनी बीमारियों और चोटों का लक्षण भी हो सकता है। सही कारण पता लगाने और सही इलाज शुरू करने के लिए, डॉक्टर स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस का इस्तेमाल करके पूरी जांच करते हैं।


फिजिकल एग्जामिनेशनः

सबसे पहले, डॉक्टर मरीज़ का पूरी तरह से फिजिकल चेकअप करते हैं। इसमें घुटने की बाहरी और अंदरूनी स्थिति को ध्यान से देखना शामिल है। डॉक्टर घुटने में सूजन, लालिमा या गर्मी की जांच करते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि दर्द कहाँ है और किन हरकतों से यह बढ़ता है। घुटने की मूवमेंट की रेंज - यानी यह कितना मुड़ सकता है और सीधा हो सकता है - का आकलन किया जाता है। मूवमेंट के दौरान किसी भी क्लिकिंग, लॉकिंग या अस्थिरता पर ध्यान दिया जाता है, और लिगामेंट्स और मेनिस्कस की ताकत की जांच के लिए खास टेस्ट किए जाते हैं। यह पूरी जांच डॉक्टर को दर्द के असली कारण को समझने में मदद करती है।


इमेजिंग जांचः


एक्स-रेः

एक्स-रे सबसे सामान्य और प्रारंभिक जांच होती है, जिससे हड्डियों की स्थिति और जोड़ की संरचना का पता चलता है, ऑस्टियोआर्थराइटिस में जोड़ की जगह कम होने की जानकारी मिलती है और हड्डी में फ्रैक्चर, डिफॉर्मिटी या कैल्शियम डिपॉजिट जैसी समस्याएं स्पष्ट होती हैं।

एमआरआईः

जब दर्द का कारण एक्स-रे से स्पष्ट नहीं हो पाता, तब एमआरआई कराई जाती है, जिससे लिगामेंट (एसीएल, पीसीएल) की चोट, मेनिस्कस टियर, कार्टिलेज की क्षति के साथ-साथ सूजन, सॉफ्ट टिश्यू और नसों की स्थिति का विस्तृत और स्पष्ट अध्ययन किया जाता है।


ब्लड टेस्टः

अगर डॉक्टर को सूजन, संक्रमण या गठिया का संदेह हो, तो खून की जांच कराई जाती है, जिसमें सीबीसी से संक्रमण या शरीर में सूजन का संकेत मिलता है, ईएसआर और सीआरपी से सूजन के स्तर का आकलन होता है, यूरिक एसिड से गाउट की पहचान की जाती है और आरएफ या एएनए टेस्ट से रूमेटॉइड आर्थराइटिस व अन्य ऑटोइम्यून रोगों का पता चलता है; ये सभी जांचें घुटने के दर्द के पीछे छिपी असली बीमारी को समझने में मदद करती हैं।


जोड़ का द्रव परीक्षणः

अगर घुटने में ज्यादा सूजन हो, तो डॉक्टर सुई की मदद से जोड़ से द्रव निकालकर उसका परीक्षण करते हैं, जिससे संक्रमण (सेप्टिक आर्थराइटिस) की पुष्टि की जाती है, गाउट  में यूरिक एसिड क्रिस्टल की पहचान होती है और खून या अन्य असामान्य तत्वों की जांच की जाती है; यह टेस्ट घुटने के दर्द के गंभीर कारणों को तुरंत पहचानने के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।

घुटने का दर्द और चोट का इलाज

घुटनों का दर्द आज की जीवनशैली में एक आम समस्या बनता जा रहा है। नोएडा ऑर्थोपेडिक डॉक्टर है। गलत बैठने-उठने की आदतें, अधिक वजन, चोट, बढ़ती उम्र और गठिया जैसी बीमारियां इसके प्रमुख कारण हैं। समय पर सही उपचार से सर्जरी की आवश्यकता को टाला जा सकता है।


गैर-सर्जिकल उपचारः


आराम और गतिविधि नियंत्रणः

अगर आपके घुटने में दर्द या सूजन है, तो आपको ज़्यादा चलना, दौड़ना, सीढ़ियाँ चढ़ना और कूदना जैसी एक्टिविटीज़ से बचना चाहिए। ज़्यादा देर तक खड़े रहने से बचना भी ज़रूरी है। बैठते समय, पालथी मारकर या ज़मीन पर उकड़ू बैठने से बचें, क्योंकि इससे घुटनों पर ज़्यादा दबाव पड़ता है। अगर ज़रूरी हो, तो घुटने के जोड़ को स्टेबिलिटी देने और दर्द और सूजन से राहत पाने के लिए नी ब्रेस, नीकैप सपोर्ट या सपोर्ट बेल्ट का इस्तेमाल करें।


आइस थेरेपीः

सूजन और दर्द कम करने के लिए बर्फ का प्रयोग बेहद लाभकारी होता है, जिसे दिन में 2 से 3 बार 10 से 15 मिनट तक करना चाहिए। बर्फ को सीधे त्वचा पर रखने के बजाय कपड़े में लपेटकर लगाना सुरक्षित रहता है। यह थेरेपी विशेष रूप से चोट लगने या अचानक हुई सूजन में काफी प्रभावी मानी जाती है।


दवाएंः

डॉक्टर की सलाह पर दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं, जैसे इबुप्रोफेन, नेप्रोक्सन और डाइक्लोफेनाक। यदि जोड़ में संक्रमण यानी सेप्टिक आर्थराइटिस की आशंका हो, तो एंटीबायोटिक्स भी दी जाती हैं। लंबे समय तक बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं लेना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।


फिजियोथेरेपीः

फिजियोथेरेपी घुटने के इलाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, जिसमें मांसपेशियों को मजबूत करने की एक्सरसाइज, जोड़ की मूवमेंट बढ़ाने वाली रेंज-ऑफ-मोशन एक्सरसाइज कराई जाती हैं और मरीज को चलने-फिरने का सही तरीका सिखाया जाता है। नियमित फिजियोथेरेपी से घुटने का दर्द कम होता है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत भी टल सकती है।


वजन नियंत्रणः

अधिक वजन घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, इसलिए वजन कम करने से घुटनों का दर्द काफी हद तक घट सकता है। इसके लिए संतुलित आहार और हल्की एक्सरसाइज अपनाना जरूरी है, साथ ही डायबिटीज और मोटापे पर नियंत्रण रखना भी घुटनों के स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।



सर्जिकल उपचारः

जब गैर-सर्जिकल उपायों से राहत नहीं मिलती, तब सर्जरी का विकल्प अपनाया जाता है।


आर्थ्रोस्कोपीः

यह एक मिनिमली इनवेसिव सर्जरी होती है, जिसमें छोटे चीरे के माध्यम से कैमरा डालकर घुटने के अंदर की समस्या देखी और ठीक की जाती है। यह प्रक्रिया मिनिस्कस टियर, लिगामेंट इंजरी या कार्टिलेज डैमेज में उपयोगी होती है, जिसमें रिकवरी जल्दी होती है और मरीज को अपेक्षाकृत कम दर्द रहता है।


नी रिप्लेसमेंट सर्जरीः

गंभीर आर्थराइटिस या जोड़ के अत्यधिक खराब होने पर नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की जाती है, जिसमें पार्शियल नी रिप्लेसमेंट के तहत केवल क्षतिग्रस्त हिस्से को बदला जाता है, कम चीरा लगता है और रिकवरी तेज होती है, इसलिए यह हल्के से मध्यम मामलों में उपयुक्त मानी जाती है। वहीं टोटल नी रिप्लेसमेंट में पूरा घुटना बदला जाता है, जो गंभीर दर्द, चलने में अधिक परेशानी और जोड़ के पूरी तरह घिस जाने की स्थिति में किया जाता है और यह लंबे समय तक राहत देने वाला प्रभावी विकल्प होता है।


सर्जरी के बाद रिकवरीः

सर्जरी के बाद सही देखभाल बहुत ज़रूरी है और इसमें वॉकर, बेंत या नी ब्रेस का इस्तेमाल, रेगुलर फिजियोथेरेपी, सूजन कम करने के लिए आइस थेरेपी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दर्द की दवा लेना शामिल है। जल्दी ठीक होने के लिए प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन D से भरपूर संतुलित आहार भी ज़रूरी है। सही देखभाल से मरीज़ कुछ ही हफ़्तों में नॉर्मल ज़िंदगी में लौट सकता है।


घर पर देखभाल और जीवनशैली


सही बैठने और उठने की स्थिति का ध्यान रखें।


  • फर्श और घर की सुरक्षा: फिसलन कम करें, एंटी-स्लिप मैट और ग्रिप हैंडल को पकड़े।
  • हल्का और नियमित व्यायाम: तैराकी, योग, साइकिलिंग करें।
  • संतुलित आहार: कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन-डी का सेवन भरपूर करें।
  • वजन नियंत्रण: हर 5 किलो वजन घटाने से घुटनों पर दबाव लगभग 20 किलो कम होता है।



नोएडा में विशेषज्ञ अस्पताल कैसे चुनें?

अनुभवी ऑर्थोपेडिक सर्जन, आधुनिक तकनीक और उन्नत इमेजिंग सुविधाएं, फिजियोथेरेपी यूनिट तथा इमरजेंसी सपोर्ट के साथ, मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और रिपोर्ट के आधार पर व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की जाती है।


निष्कर्ष 

लंबे समय तक घुटने का दर्द जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा असर डालता है। समय पर जांच और इलाज जरूरी है। दवा, फिजियोथेरेपी, जीवनशैली सुधार और जरूरत पड़ने पर सर्जरी से दर्द और सूजन को नियंत्रित किया जाता है। विशेषज्ञ ऑर्थोपेडिक अस्पताल में सही उपचार से घुटने की कार्यक्षमता लंबे समय तक बनी रहती है। समय पर जांच और इलाज जरूरी है।


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